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Showing posts from April, 2019

महात्मा गांधी में इस जगह अहिंसा का बीज पनपा

पहली नज़र में देखें तो दक्षिण अफ्रीका का पीटरमारित्ज़बर्ग रेलवे स्टेशन कि सी गुज़रे ज़माने का लगता है. ख़ाली प्लेटफॉर्म, 19वीं सदी की विक्टोरियन स्टाइल की लाल ईंटों वाली इमारत, ज़ंग खा रही जालियां और लकड़ी की बनी टिकट खिड़की, सब कुछ बहुत पुराना सा लगता है. इस मामूली से स्टेशन को देखक र लगता ही नहीं कि ये वो जगह है जिसने हिंदुस्तान को बदल डाला और दुनिया की तारीख़ में एक नया पन्ना जोड़ दिया. ये बात 7 जून 1893 की है. उस वक़्त युवा वकील र हे मोहनदास करमचंद गांधी रेलगाड़ी से डरबन से प्रिटोरिया जा रहे थे. असल में वो अपने मुवक्किल दादा अब्दुल्लाह के काम से जा रहे थे. जब उनकी ट्रेन पीटरमारित्ज़बर्ग पर रुकी, तो ट्रेन के कंडक्टर ने उन्हें फ़र्स्ट क्लास के डिब्बे से निकल जाने को कहा. ट्रेन के अंग्रेज़ कंडक्टर ने गांधी को निचले दर्जे के मुसाफ़िरों के डब्बे में जाने को कहा. जब गांधी ने कंडक्टर को अपना पहले दर्जे का टिकट दिखाया, तो भी वो माना नहीं और मोहनदास गांधी को बेइज़्ज़त कर के ट्रेन से ज़बरदस्ती उतार दिया. पीटरमारित्ज़बर्ग के प्लेटफॉर्म पर लगी एक तख़्ती ठीक उस जगह को बताती ...

هل هناك "حب من أول نظرة" حقا؟

يتسم الجانب العلمي المرتبط بمسألة أخذ الانطباعات الأولى عمن حولنا بالتعقيد، ويتأثر كذلك بعوامل تقع خارج نطاق سيطرتنا، وبصورٍ نمطيةٍ غير دقيقةٍ، وعمليات معالجة لا نفهمها تدور في ثنايا الجهاز العصبي. لكن إذا تمكنّا من بلورة فهمٍ أفضل لما يجري على هذا الصعيد، ربما ستسنح لنا فرصةٌ ما لأن نعثر على ما ننشده من شريك لحياة أوٍ لعلاقةٍ عاطفية. وثمة أدلةٌ تفيد بأنه بوسعنا تقييم مدى جاذبية شخصٍ ما في غمضة عين، لكن ذلك لا يع ني بالضرورة أن مثل هذا التقييم دقيق. وتكون تَبعات هذا لا يُستهان بها، إذ أن الحكم الخاطئ المتعجل على البعض بأنهم غير جذابين يجعلنا نستبعدهم بشكلٍ فوري من ق ائمة من نفكر في الارتباط ب هم عاطفياً، ما قد يفضي إلى أن نخسر عدداً من الخيارات التي ربما تكون أكثر ملائمةٍ بكثيرٍ من غيرها بالنسبة لنا. وتسهم عوامل مثل البيئة التي نعيش فيها وطبيعة شخصيا تنا وشخصيات من حولنا والمشاعر التي تصدر ممن نلتقيهم، في تحديد مدى احتمالية أن نقيم علاقةً إيجابيةً على نحوٍ فوريٍ مع من نراهم. إذا ما الذي يحدث عندما نبلور انطباعاً أول دقيقاً عن إمكانية الارتباط عاطفياً بشخصٍ ما؟ وكيف يم...

अहमद पटेल के साथ कितने अहमद, कितने पटेल?

जुहापुरा में एक विशेष क़ा नून लागू होता है. ये क़ानून शहर में हिंदू-मुस्लिम के एक साथ मिलजुल कर रहने में तो आड़े आता ही है बल्कि इस इलाक़े के विकास में भी रुकावट बनता है. इस कानून को लोग डिस्टर्ब एरियाज़ ऐक् ट या अशांत क्षेत्र एक्ट का नाम देते हैं. इसके तहत हिंदू बहुल इलाक़ों में मुसलमान और मुसलमान बहुल इलाकों में हिंदू सीधे संपत्ति नहीं ख़रीद सकते. इसका असर ये होता है कि मु सलमान ख़रीदार हिंदू बहुल इलाक़े में ऊंची क़ीमत देकर भी संपत्ति नहीं ख़रीद पाते. इसी तरह मुस्लिम बहुल इलाक़े में हिंदुओं को संपत् ति ख़रीदने के लिए लंबी क़ानूनी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है और ज़िला कले क्टर से मंज़ूरी लेनी पड़ती है. ये क़ानून यहां दूसरे धर्मों पर भी लागू होता है. यह क़ानून 1991 से गुजरात में है और नरेंद्र मोदी के 13 साल तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद इसे बदला नहीं गया. पिछले साल अहमदाबाद के 770 नए इ लाक़ों को इस क़ानून के अंदर लाया गया है . जुहापुरा में लंबे समय तक मूलभूत सुविधाओं की कमी र ही है लेकिन आसिफ़ सैय्यद कहते हैं कि धीरे-धीरे स्थिति बदल रही है और अब यहां राष्ट्रीय बैंकों क...

'लव जिहाद' इस बार चुनावी मुद्दा क्यों नहीं?

मेरठ के संदीप पहल बजरंग दल की तरफ़ से "लव जिहाद" और "घर वापसी" की मुहिम में काफ़ी सक्रिय रहते थे. लेकिन अब वो मायूस हैं क्योंकि उनके अनुसार इन मुद्दों का सियासी पार्टियों ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया. वो इस बात से हैरान नहीं हैं कि इन्हें और राम मंदिर जैसे मुद्दों को इस बार चुनावी मुद्दा नहीं बनाया गया. दो साल पहले उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के दौरा न "लव जिहाद" एक चुनावी मुद्दा था. पिछले आम चुनाव में भी ये मुद्दा बना था. लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पां च दिनों की यात्रा के दौरान "लव जिहाद" और " घर वापसी" जैसे मुद्दे सुनने को नहीं मिले. यहाँ पहले चरण में 11 अप्रै ल को आठ सीटों पर मतदान होगा. यूँ तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदि त्यनाथ "लव जिहाद" के ख़िलाफ़ मुहिम चलाने में काफ़ी सक्रिय रहे हैं लेकिन स्थानीय स्तर पर मेरठ में बज रंग दल के पूर्व कार्यकर्ता संदीप पहल "लव जिहाद" कहे जाने वाले रिश्तों को रोकने में सब से आगे रहे हैं. इन्होंने कई मुस्लिम ल ड़के और हिन्दू लड़कियों के रिश्तों...