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अहमद पटेल के साथ कितने अहमद, कितने पटेल?

जुहापुरा में एक विशेष क़ानून लागू होता है. ये क़ानून शहर में हिंदू-मुस्लिम के एक साथ मिलजुल कर रहने में तो आड़े आता ही है बल्कि इस इलाक़े के विकास में भी रुकावट बनता है.
इस कानून को लोग डिस्टर्ब एरियाज़ ऐक्ट या अशांत क्षेत्र एक्ट का नाम देते हैं. इसके तहत हिंदू बहुल इलाक़ों में मुसलमान और मुसलमान बहुल इलाकों में हिंदू सीधे संपत्ति नहीं ख़रीद सकते.
इसका असर ये होता है कि मुसलमान ख़रीदार हिंदू बहुल इलाक़े में ऊंची क़ीमत देकर भी संपत्ति नहीं ख़रीद पाते. इसी तरह मुस्लिम बहुल इलाक़े में हिंदुओं को संपत्ति ख़रीदने के लिए लंबी क़ानूनी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है और ज़िला कलेक्टर से मंज़ूरी लेनी पड़ती है. ये क़ानून यहां दूसरे धर्मों पर भी लागू होता है.
यह क़ानून 1991 से गुजरात में है और नरेंद्र मोदी के 13 साल तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद इसे बदला नहीं गया. पिछले साल अहमदाबाद के 770 नए इलाक़ों को इस क़ानून के अंदर लाया गया है.
जुहापुरा में लंबे समय तक मूलभूत सुविधाओं की कमी रही है लेकिन आसिफ़ सैय्यद कहते हैं कि धीरे-धीरे स्थिति बदल रही है और अब यहां राष्ट्रीय बैंकों की कई शाखाएं खुली हैं.
वो कहते हैं, "पहले यहां राष्ट्रीय बैंक की शाखाएं नहीं थीं और लोन लेने में काफ़ी दिक्क़त होती थी".
वहीं अच्युत याज्ञनिक कहते हैं कि 2002 के दंगों के बाद जुहापुरा जैसे दूसरे मुस्लिम बस्तियों में शैक्षणिक संस्थाओं की संख्या बढ़ी हैं और लोगों में शिक्षा का स्तर सुधरा है और साथ-साथ जागरूकता भी बढ़ी है.
मुनव्वर पतंगवाला कहते हैं कि जब शाह सरखेज से चुनाव लड़ते थे तब भी वो प्रचार करने के लिए जुहापुरा में नहीं जाते थे.
2012 में अमित शाह ने नवगठित नारणपुरा से चुनाव लड़ा था. परिसीमन के कारण उनकी जीत का अंतर 60 हज़ार हो गया था. फ़िलहाल नारणपुरा सीट गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र में आ गई है.
देखा जाए तो अगर गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जाता है तो उस प्रयोग का केंद्र गांधीनगर ही रहा है.
इस चुनाव क्षेत्र में 1989 से चुनाव एकतरफ़ा रहे हैं, जिसमें बीजेपी के उम्मीदवार बड़े अंतर से जीत दर्ज करते रहे हैं.
ये एक वीआईपी चुनाव क्षेत्र भी रहा है जहां से अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और शंकर सिंह वाघेला (जब बीजेपी में थे) जीतते रहे थे.
यहां की मुसलमान आबादी को देखते हुए अहमदाबाद में कई लोग जुहापुरा के लिए 'मिनी पाकिस्तान' शब्द का उपयोग करते हैं.
ठाकोर और पाटीदार समुदाय की बहुलता वाले इलाक़े वेजलपुर से जुहापुरा को अलग करने वाले रास्ते, गलियां, दीवार और मैदान को स्थानीय लोग बॉर्डर के तौर पर देखते हैं.
ये बॉर्डर जुहापुरा को भौगौलिक और सामाजिक तौर पर अलग रखती है लेकिन इससे कहीं ज़्यादा ये इस इलाके़ में रहने वालो को मानसिक तौर पर भी अलग करती है.
लालीवाला कहते हैं कि हिंदू और मुस्लिम बच्चे साथ में पढ़ें, खेलें और उनके बीच बातचीत हो तो जुहापुरा में रहने वाले लोग और अहमदाबाद के दूसरे इलाक़े के लोगों के बीच की खिंची ये अदृश्य सीमा हट सकती है. हालांकि वो मानते हैं कि आने वाले दस सालों में उन्हें ऐसा होता नज़र नहीं आ रहा.

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