"फूला हुआ पेट, कांपते हुए हाथ और बोझिल दिखती छोटी-छोटी आंखें...उसकी हर सांस ज़िंदगी से संघर्ष करती हुई दिखती है."
क़रीब पांच किलो की सीता सिर्फ़ बच्चों ही नहीं प्रशासनिक व्यवस्था में फैले हुए कुपोषण का ज़िंदा दस्तावेज़ है. वाराणसी के सजोईं गांव में रहने वाली इस बच्ची की मां अशरफ़ी के मन में बस एक सवाल है कि सरकार उसकी बच्ची की सेहत सुधारने के लिए कोई कारगर कदम क्यों नहीं उठाती?
यही सवाल अमेठी में रहने वालीं लीलावती भी उठाती हैं जिनकी नातिन पलक भी गंभीर रूप से कुपोषण की चपेट में है.
ये वो महिलाएं हैं जिन्होंने साल 2014 में नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य तय करने में अपनी-अपनी भूमिका निभाई थी .
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संसदीय सीट वाराणसी के सजोईं गांव में रहने वाली अशरफ़ी की आंखें अपनी बच्ची सीता की हालत बयां करते हुए आंसुओं से भर जाती हैं.
भूख से बिलखती सात महीने की बच्ची सीता को अपने सीने से लगाए अशरफ़ी कहती हैं, "हमारी बच्ची तो उसी दिन से कष्ट में है जिस दिन ये पैदा हुई. जनम के समय चार-चार अस्पतालों के चक्कर काटे. कहीं किसी ने नहीं लिया. घर पर 'आशा बहू' को बुलाया तो वो भी नहीं आई. इसके बाद घर में ही इसका जनम हुआ. ये तब से ही बीमार है."
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार, जन्म के समय किसी भी बच्चे का वज़न 2.4 किलोग्राम से कम नहीं होना चाहिए.
सात महीने की उम्र में सीता का वज़न 6 किलोग्राम से भी ज़्यादा होना चाहिए. लेकिन इस बच्ची का वज़न मात्र 5 किलोग्राम है.
वजन के आधार पर सीता जैसे बच्चे अतिकुपोषित बच्चों की श्रेणी में आते हैं.
केंद्र सरकार ऐसे ही बच्चों को कुपोषण से उबारने के लिए ही बाल विकास एवं पुष्टाहार योजना और मिड डे मील जैसी योजनाएं चला रही है.
साल 1975 में शुरू हुई इस योजना का उद्देश्य भारत में कुपोषण की मार झेल रहे लगभग चालीस फ़ीसदी बच्चों को कुपोषण की गिरफ़्त से बाहर निकालना है.
इसके तहत आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को 0 से 6 माह के बच्चों के परिवारों को हर महीने पंजीरी (बीनिंग फूड - लगभग एक किलोग्राम), मीठा दलिया (लगभग एक किलोग्राम) और नमकीन दलिया (लगभग एक किलोग्राम) देना चाहिए.
लेकिन पुष्टाहार बांटे जाने के तरीके पर नाराज़गी जताते हुए अशरफ़ी कहती हैं, "वो बस दलिया दे देती हैं. वो भी हमेशा नहीं मिलता है. कभी मिल जाता है. कभी नहीं मिलता है. कभी उन्होंने ये नहीं बताया कि बिटिया को ये सब कैसे खिलाना है. हम तो इतने पढ़े-लिखे नहीं हैं कि पैकेट पर लिखी हुई चीज़ें पढ़ सकें. जब भी बनाकर खिलाती हूं तो इसे दस्त लग जाते हैं. फिर डाक्टर-अस्पताल के चक्कर काटने पड़ते हैं...अब ऐसे में मेरी जैसे दिहाड़ी मजदूर क्या करे. डाक्टर का खर्चा संभालें या इसे खिलाएं-पिलाएं?"
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के रवैये पर बनारस के ही परमंदापुर गांव में रहने वाली दो साल के बच्चे साजन की मां सोनी भी असंतोष व्यक्त करती हैं.
सोनी कहती हैं, "आंगनबाड़ी वाले कभी बता देते हैं कि पांच तारीख़ को मिलेगा पुष्टाहार. कभी कोई सूचना ही नहीं आती है. ऐसे में हर महीने कैसे मिले पुष्टाहार."'
वहीं, दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करने वाले साजन के पिता जय प्रकाश अपने बच्चे की हालत को लेकर अपने सांसद के प्रति आक्रोश ज़ाहिर करते हैं.
वह कहते हैं, "हमारे बच्चे की हालत बहुत ख़राब है. इसकी उमर दो साल है. इतने में इसका वज़न 10 किलो से ज़्यादा होना चाहिए था. लेकिन इसका वज़न लगातार घटता जा रहा है. जब तक दवा चलती है तब तक मेरा बच्चा ठीक रहता है. दवा ख़त्म होते ही बीमारी फिर लौट आती है. मैं मज़दूर हूं. समझ नहीं आता है कि मैं अपने बच्चे के लिए खाने की ख़ातिर पैसे जुटाऊं या दवा के लिए. हमारे सांसद होने के नाते मोदी जी कुछ तो कर ही सकते हैं."
रिपोर्ट बताती है कि अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति में जन्म लेने लड़कों में से 32.4 फीसदी बच्चे कुपोषण से पीड़ित होते हैं. वहीं, अन्य जातियों के लिए ये प्रतिशत 21 फीसदी है.
अनुसूचित जातियों-जनजातियों में जन्म लेने वाली लड़कियों में 31.7 फीसदी कुपोषण का शिकार होती हैं.
वहीं, अन्य जातियों में जन्म लेने वाली लड़कियों में से 20.1 फीसदी बच्चियां कुपोषण से पीड़ित होती हैं.
ये रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि इन जातियों में जन्म लेने वाले बच्चे किस तरह इन सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं.
हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर एस वी सुब्रमण्यन ने हाल ही में अंग्रेजी वेबसाइट स्क्रॉल को दिए एक इंटरव्यू में इसका उल्लेख भी किया है.
सुब्रमण्यन कहते हैं, "कुपोषण को बढ़ाने में सामाजिक-आर्थिक स्तर की एक बड़ी भूमिका होती है. बच्चों को कुपोषित बनाने में जातिगत भेदभाव भी अपनी एक भूमिका अदा करता है. मुझे लगता है कि घर से लेकर गांव के स्तर पर आर्थिक तंगी बच्चों को कुपोषण की ओर ले जाती है."
वाराणसी की पिंडरा तहसील के पिंडारा गांव में रहने वाली गीता मुसहर जाति से आती हैं.
ये एक ऐसी जाति है जिसे समाज में भारी उपेक्षा का सामना करना पड़ता है.
गीता कहती हैं, "हमारे पास न घर है न मढ़ैया. न खेत न क्यारी. कुनबी और ठाकुर जाति के लोग भी मारते हैं. ऐसे में हम जाएं तो कहां जाएं. हमारे तीन-तीन लड़कियां हैं. पति विकलांग हैं. भट्टे पर जाकर काम करते हैं. इन्हें खिलाने की ख़ातिर."
"भट्टे वाले का बीस हज़ार रुपये कर्जा हमारे ऊपर है. वहां तो जाना ही पड़ेगा न. भट्टे पर जाते-जाते ये हमारा लड़का भी कुपोषित हो गया. जब हम ही पेट भर खाना नहीं खा पाएंगे तो बच्चे के लिए दूध कहां से होगा."
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