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वर्ल्ड कप 2019: भारत-पाक क्रिकेट इतिहास के बारे में क्या जानना चाहते हैं आप?

क्रिकेट वर्ल्ड कप में 16 जून को भारत और पाकिस्तान की टीमें आमने-सामने होंगी.
ये सातवीं बार होगा, जब भारत और पाकिस्तान की टीमें एक दूसरे के ख़िलाफ़ विश्व कप में उतरेंगी. अब तक हुए विश्व कप मैच में सारे मैच इंडिया ने जीते हैं.
2019 विश्व कप में भारत-पाकिस्तान रविवार को मैनचेस्टर में भिड़ेंगे. आप हमें बताइए कि आप भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट रिश्तों के इतिहास के बारे में क्या जानना चाहते हैं?
आपके पूछे सवालों और सुझावों पर हम रिपोर्टिंग करेंगे. नीचे दिख रहे कमेंटबॉक्स में लिखिए अपने सवाल और हमसे पूछिए भारत-पाकिस्तान क्रिकेट इतिहास के बारे में आप क्या जानना चाहते हैं?
पुरुष प्रधान दफ़्तरों में महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे एक निश्चित तरीके से दिखें और कपड़े पहनें. हमने कितनी भी तरक्की की हो, लोग टिप्पणी करने से बाज़ नहीं आते.
इंग्लैंड के डेवोन की स्कूल टीचर लिंडसे बाउर को फ़ैशन करना अच्छा लगता है.
वह चाहे चटख रंगों वाली ट्रॉपिकल ड्रेस पहनें या कोई सिकुड़ा हुआ श्रग, उनको लगता है कि काम के दौरान वह जो भी कपड़े पहनती हैं वह बहुत मायने रखता है.
उनको याद है कि कैसे एक छात्रा ने उनको स्कूल के कॉरीडोर में रोक दिया था. वह अपनी टीचर के जूतों से प्रभावित थी. "मिस, मुझे आपके जूते बहुत पसंद हैं. आपने ये कहां से लिए?"
बाउर कहती हैं, "उस दिन से हमारी बातें होने लगीं. हम जब भी मिलते, कुछ बातें होतीं. वह बताती कि वह इन दिनों क्या-क्या पढ़ रही है और अब उसकी अंग्रेजी अच्छी हो रही है."
"आपको उन सबके साथ एक पेशेवर रिश्ता बनाना होता है. इसका सबसे आसान रास्ता है कि आप क्या पहनते हैं."
वह कहती हैं, "एक महिला के रूप में ख़ुद को खोने न दें. बोल्ड बनिए. रंगीन कपड़े पहनिए. कुछ ऐसा पहनिए जो सरहदों को तोड़ता हो, उनको थोड़ा पीछे धकेलता हो."
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में आधुनिक इतिहास की लेक्चरार हेलेन मैकार्थी कहती हैं कि ऑफिस में महिलाओं की ड्रेस का बहुत विकास हुआ है.
1900 के पहले दशक से महिलाओं को अपनी कमाई के पैसे रखने की अनुमति मिलने लगी, कम से कम ब्रिटेन में.
तब महिलाओं का अपने कपड़ों पर नियंत्रण इस बात पर निर्भर करने लगा कि वह किस तरह के काम करती है.
उन दिनों घरेलू सेवा महिलाओं के लिए रोज़गार का सबसे बड़ा स्रोत था. वहां महिलाओं का अपने पहनावे पर बहुत कम नियंत्रण था.
कारखानों में काम करने वाली महिलाओं के पास ख़ुद को अभिव्यक्त करने की थोड़ी ज़्यादा आज़ादी थी.
अपने एप्रन या चोगे के नीचे वे पैटर्न वाला ब्लाउज़ या रंगीन मोज़े पहन सकती थीं. वे अपने बालों को भी अपने हिसाब से संवार सकती थीं.
मैकार्थी कहती हैं, "दिलचस्प है कि (इस अवधि में) महिलाएं बहुत सारा काम करती हैं और उन्हें बहुत कम भुगतान मिलता है."
"लेकिन महिलाएं अपने व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करने के तरीके खोज लेती हैं, भले ही श्रमिकों में उनकी स्थिति निचले पायदान पर हो."
उदाहरण के लिए, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान युद्ध के साजो-सामान, हथियार और गोला-बारूद बनाने वाली महिलाओं के लिए सख़्त नियम थे कि वे क्या पहनें.
"फिर भी आप उनको सिर पर रंगीन बैंडाना पहने हुए या जूतों को रंगीन फीतों से बांधे हुए देख सकते हैं."
"उनको अपने व्यक्तित्व को सामने लाने का और पूंजीवाद की एकरूपता की कोशिशों को धक्का देने का जब भी मौका मिला, उन्होंने उसका इस्तेमाल किया."
पहले विश्व युद्ध के बाद 1920 के आसपास महिलाओं को फ़ैशन की ज़्यादा आज़ादी मिली. कमर पर कपड़े नीचे होने लगे और जांघों पर उनकी ऊंचाई बढ़ने लगी.
उन दिनों कई नौकरियों में महिलाओं के लिए वर्दी तय कर दी गई, जैसे नर्स, वेट्रेस वगैरह.
एक मायने में इसने दफ़तरों में पहने जाने वाले कपड़ों के विकल्प को आसान बना दिया, लेकिन इसने प्रतीकात्मक बोझ बढ़ा दिया. वर्दी वाली महिलाओं ने ब्रिटेन के सामाजिक ताने-बाने को झकझोर दिया.
मैकार्थी कहती हैं, "वर्दी सेना से जुड़ी है. दो विश्वयुद्धों के दौरान महिलाओं को वर्दी पहनाने को लेकर बहुत बेचैनी रही."
युद्ध के सामाजिक उथल-पथल के बीच लैंगिक विभाजन और स्त्रीत्व को सुरक्षित रखने को महत्वपूर्ण माना गया.
महिलाओं की वर्दी के बारे में विस्तृत यूनिफॉर्म कोड नहीं होने से इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि कुछ अनौपचारिक नियम महिलाओं की पोशाक को नियंत्रित करते हैं.
1960 के दशक में जब पेशेवर महिलाएं बच्चों को बड़ा करने के बाद अपने काम पर वापस आने लगीं, तमहिला संगठनों ने उनकी पोशाक के लिए समय और पैसे का मुद्दा उठाया.
कपड़ों और सजने-संवरने पर होने वाले ख़र्च को जोड़कर देखा गया कि दोबारा नौकरी शुरू करना उनके लिए फायदेमंद है भी या नहीं.
आज की बात करें तो महिलाओं की बहुसंख्यक आबादी के लिए नाखून और बालों को सजाकर रखना नौकरी की मजबूरी नहीं है.
लेखिका और कॉमेडियन विव ग्रोस्कोप का कहना है कि लुक के प्रति सचेत रहना नारीवाद के विरोधाभासों और उसकी सीमाओं को उजागर करता है.
एक तरफ ज़्यादातर महिलाओं को यह चुनने की आज़ादी है कि वे क्या पहनकर काम करना चाहती हैं, लेकिन हक़ीक़त इससे अलग है.
ग्रोस्कोप कहती हैं. "हक़ीक़त यह है कि लोग आपको आपके कपड़े से आंकते हैं."
सिटी वूमेन नेटवर्क की उपाध्यक्ष उमा क्रेसवेल कॉरपोरेट जगत की अनुभवी महिला हैं. उन्होंने 90 के दशक से ही बैंकिंग क्षेत्र में काम किया है.
उनका कहना है कि ट्रेडिंग फ्लोर पर पुरुषों के साथ काम करते हुए विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए आपको एक निश्चित तरीके से कपड़े पहनने पड़ते हैं.
"वह दुनिया बहुत औपचारिक थी. ट्राउजर्स को दरकिनार कर दिया गया था. किसी भी दिन कैजुअल कपड़े नहीं पहन सकते थे. अगर मैं ऐसा करती तो मुझे गंभीरता से नहीं लिया जाता."
स्टार्ट-अप्स के आने से कामकाजी दुनिया अब पहले से कहीं ज़्यादा कैजुअल है, लेकिन बैंकिंग क्षेत्र अब भी बहुत औपचारिक है. "(वहां) महिलाओं से एक ख़ास तरीके से कपड़े पहनने की दरकार की जाती है."
"इससे यह भी पता चलता है कि हम कैसे यहां तक पहुंचे हैं, फिर भी कुछ ख़ास भूमिकाओं के लिए निश्चित मानक हैं."

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