उन्होंने बताया कि किस तरह से ईशनिंदा के
आरोपों का सामना कर रहे अभियुक्तों को एकदम अलग, अति सुरक्षा वाले बैरकों
में रखा जाता है. अमूमन उन्हें मानसिक रूप से बीमार लोगों के साथ भी रखा जाता है.
ज़्यादातर समय उन्हें अपने बैरकों में बंद रखा जाता है और उनकी सुरक्षा के चलते ही उन्हें आम कैदियों के साथ खाने के लिए नहीं भेजा जाता, आशंका ये भी रहती है कि कोई उनको ज़हर ना दे दे.
शकील बताते हैं, "मेरे साथ रावलपिंडी की जेल में एक कैदी थे. वो यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर थे. वे जिस तरह से जन्नत और दोजख के बारे में बताते थे, उससे एक छात्र सहमत नहीं हुआ और उसने ईशनिंदा का मुक़दमा दर्ज करा दिया."
शकील मानते हैं कि वे उन गिने-चुने खुशकिस्मत लोगों में से हैं जिन्हें अपनी आज़ादी वापस मिली है, लेकिन आज़ादी मिलने से ज़्यादा वे इस आरोप से बरी होना चाहते हैं.
वे कहते हैं, "ईशनिंदा के इलज़ाम का चस्पा, मौत के डर से भी भयावह है. मैं इस गंभीर आरोप के साथ मरना नहीं चाहता. मैं चाहता हूं कि इस मामले में मैं बरी हो जाऊं ताकि समाज में मेरा परिवार गरिमा के साथ रह पाए."
ज़्यादातर समय उन्हें अपने बैरकों में बंद रखा जाता है और उनकी सुरक्षा के चलते ही उन्हें आम कैदियों के साथ खाने के लिए नहीं भेजा जाता, आशंका ये भी रहती है कि कोई उनको ज़हर ना दे दे.
शकील बताते हैं, "मेरे साथ रावलपिंडी की जेल में एक कैदी थे. वो यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर थे. वे जिस तरह से जन्नत और दोजख के बारे में बताते थे, उससे एक छात्र सहमत नहीं हुआ और उसने ईशनिंदा का मुक़दमा दर्ज करा दिया."
शकील मानते हैं कि वे उन गिने-चुने खुशकिस्मत लोगों में से हैं जिन्हें अपनी आज़ादी वापस मिली है, लेकिन आज़ादी मिलने से ज़्यादा वे इस आरोप से बरी होना चाहते हैं.
वे कहते हैं, "ईशनिंदा के इलज़ाम का चस्पा, मौत के डर से भी भयावह है. मैं इस गंभीर आरोप के साथ मरना नहीं चाहता. मैं चाहता हूं कि इस मामले में मैं बरी हो जाऊं ताकि समाज में मेरा परिवार गरिमा के साथ रह पाए."
पाकिस्तान में ईशनिंदा क़ानून साल 1980 के दशक से ज़्यादा सख्त बनाया गया. ऐसा देश में ध्रुवीकरण बढ़ने के साथ किया गया.
साल 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ ने हमला किया और अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामी चरमपंथियों को मदद देने का अपना गुप्त अभियान शुरू किया था. पाकिस्तान अमरीका का सबसे अहम सहयोगी था.
अफ़ग़ान जिहाद में शामिल होने से पाकिस्तान को काफ़ी आर्थिक फ़ायदा मिला, लेकिन इससे देश में धार्मिक कट्टरपन भी बढ़ा.
अगले एक दशक में, देश भर में धार्मिक रूप से कट्टरपंथी समूहों की राजनीतिक और सामाजिक ताक़त तेजी से बढ़ी.
साल 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ ने हमला किया और अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामी चरमपंथियों को मदद देने का अपना गुप्त अभियान शुरू किया था. पाकिस्तान अमरीका का सबसे अहम सहयोगी था.
अफ़ग़ान जिहाद में शामिल होने से पाकिस्तान को काफ़ी आर्थिक फ़ायदा मिला, लेकिन इससे देश में धार्मिक कट्टरपन भी बढ़ा.
अगले एक दशक में, देश भर में धार्मिक रूप से कट्टरपंथी समूहों की राजनीतिक और सामाजिक ताक़त तेजी से बढ़ी.
वे अब कहीं ज़्यादा सशक्त दिख रहे थे बल्कि अपनी बात मुखर रूप से रखने लगे थे.
जनरल ज़िया उल-हक़ के शासन में सरकार ने खुले तौर पर इस्लाम के बेहद कट्टर समूह वहाबियों को आगे बढ़ाया.
शरिया लागू करने के लिए क़ानून को सख़्त बनाया गया, उसमें संशोधन हुए. ताकि पाकिस्तान वास्तव में एक मुस्लिम देश बन सके.
इन हालात में पाकिस्तान की संसद ने साल 1986 में ईशनिंदा क़ानून में बदलाव किया.
जनरल ज़िया उल-हक़ के शासन में सरकार ने खुले तौर पर इस्लाम के बेहद कट्टर समूह वहाबियों को आगे बढ़ाया.
शरिया लागू करने के लिए क़ानून को सख़्त बनाया गया, उसमें संशोधन हुए. ताकि पाकिस्तान वास्तव में एक मुस्लिम देश बन सके.
इन हालात में पाकिस्तान की संसद ने साल 1986 में ईशनिंदा क़ानून में बदलाव किया.
मूलरूप में इस क़ानून को ब्रिटिश शासकों
ने बनाया था. इस क़ानून का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के तहत हिंदू, मुसलमान,
ईसाई और सिख के बीच धार्मिक कलह को नियंत्रण में रखना था.
इस क़ानून के तहत इबादत की जगह और धार्मिक वस्तुओं की सुरक्षा संभव थी. इसके अलावा धार्मिक आयोजनों में किसी तरह का व्यवधान, कब्रगाहों का अतिक्रमण और जानबूझ कर किसी की धार्मिक आस्था का अपमान करना, ये सब भी अपराध के दायरे में आता था. ऐसे मामलों में दस साल तक के कैद का प्रावधान था.
साल 1927 में राजनीतिक तनाव और विभिन्न समुदायों के बीच मनमुटाव को देखते हुए इस क़ानून का सख़्त बनाया गया था.
लेकिन साल 1986 में पाकिस्तान की संसद के नए संशोधनों से पहले तक ईशनिंदा क़ानून किसी भी धर्म का कोई पक्ष नहीं लेता था.
लेकिन 1986 में हुए संशोधनों में एक क्लॉज जोड़ा गया जिसके मुताबिक़ पैगंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ अपमानजनक बातें भीं अपराध के दायरे में आ गईं और इसमें मौत या फिर उम्र कैद की सज़ा का प्रावधान किया गया.
सेक्शन 295-सी के इस क्लॉज का केवल एक नेता ने विरोध किया था. विरोध करने वाले नेता थे मोहम्मद हमज़ा.
इस क़ानून के तहत इबादत की जगह और धार्मिक वस्तुओं की सुरक्षा संभव थी. इसके अलावा धार्मिक आयोजनों में किसी तरह का व्यवधान, कब्रगाहों का अतिक्रमण और जानबूझ कर किसी की धार्मिक आस्था का अपमान करना, ये सब भी अपराध के दायरे में आता था. ऐसे मामलों में दस साल तक के कैद का प्रावधान था.
साल 1927 में राजनीतिक तनाव और विभिन्न समुदायों के बीच मनमुटाव को देखते हुए इस क़ानून का सख़्त बनाया गया था.
लेकिन साल 1986 में पाकिस्तान की संसद के नए संशोधनों से पहले तक ईशनिंदा क़ानून किसी भी धर्म का कोई पक्ष नहीं लेता था.
लेकिन 1986 में हुए संशोधनों में एक क्लॉज जोड़ा गया जिसके मुताबिक़ पैगंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ अपमानजनक बातें भीं अपराध के दायरे में आ गईं और इसमें मौत या फिर उम्र कैद की सज़ा का प्रावधान किया गया.
सेक्शन 295-सी के इस क्लॉज का केवल एक नेता ने विरोध किया था. विरोध करने वाले नेता थे मोहम्मद हमज़ा.
हमज़ा की उम्र अब 90 साल से ज़्यादा हो
चुकी है, वे उस दिन को आज भी याद करते हैं कि जिस दिन पाकिस्तान के नेशनल एसेंबली में इस क़ानून पर बहस हुई थी.
साल 1986 में हुई बहस में अपने संबोधन में हमज़ा ने दलील दी थी कि मौत की सज़ा की मांग करने वाले जिन इस्लामी ग्रंथों का हवाला दे रहे हैं, उस पर कोई भी फ़ैसला लेने से पहले इसकी धार्मिक विद्धानों की ओर से विस्तृत समीक्षा की ज़रूरत है. इसके बाद ही क़ानून में बदलाव के प्रस्ताव को पारित किया जाना चाहिए.
वे दावा करते हैं कि इस मुद्दे पर तब संसद में गंभीर बहस नहीं हुई थी, संसद की भूमिका गैर ज़िम्मेदाराना थी.
हमज़ा कहते हैं, "मेरा दृढ़ विश्वास है कि आप सेलेक्टिव जस्टिस (कुछ लोगों को न्याय) के साथ देश नहीं चला सकते. ऐसे क़ानून का क्या मतलब जो समाज को तोड़ने का काम करे?"
"हमारे लोग गंभीरता से सोचते नहीं हैं. वे धर्म को लेकर गैर तार्किक रूप से भावनात्मक हो जाते हैं. ऐसे में मैं जानता था कि इस क़ानून का ग़लत इस्तेमाल होगा. इसलिए मैंने इसका विरोध किया था."
उस दिन केवल हमज़ा ही क़ानून में बदलाव के ख़िलाफ़ बोले थे. उसी दिन 295-सी की धारा तत्काल प्रभाव से पारित हो गई.
साल 1986 में हुई बहस में अपने संबोधन में हमज़ा ने दलील दी थी कि मौत की सज़ा की मांग करने वाले जिन इस्लामी ग्रंथों का हवाला दे रहे हैं, उस पर कोई भी फ़ैसला लेने से पहले इसकी धार्मिक विद्धानों की ओर से विस्तृत समीक्षा की ज़रूरत है. इसके बाद ही क़ानून में बदलाव के प्रस्ताव को पारित किया जाना चाहिए.
वे दावा करते हैं कि इस मुद्दे पर तब संसद में गंभीर बहस नहीं हुई थी, संसद की भूमिका गैर ज़िम्मेदाराना थी.
हमज़ा कहते हैं, "मेरा दृढ़ विश्वास है कि आप सेलेक्टिव जस्टिस (कुछ लोगों को न्याय) के साथ देश नहीं चला सकते. ऐसे क़ानून का क्या मतलब जो समाज को तोड़ने का काम करे?"
"हमारे लोग गंभीरता से सोचते नहीं हैं. वे धर्म को लेकर गैर तार्किक रूप से भावनात्मक हो जाते हैं. ऐसे में मैं जानता था कि इस क़ानून का ग़लत इस्तेमाल होगा. इसलिए मैंने इसका विरोध किया था."
उस दिन केवल हमज़ा ही क़ानून में बदलाव के ख़िलाफ़ बोले थे. उसी दिन 295-सी की धारा तत्काल प्रभाव से पारित हो गई.
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